कांग्रेस बिहार विधानसभा चुनाव में पूरी तरह बदली हुई नजर आ रही है। चुनाव की आहट से पहले ही पार्टी ने कृष्णा अल्लावरु को प्रदेश प्रभारी बनाकर संकेत दे दिया कि इस बार कुछ अलग होने वाला है। जहां पहले कांग्रेस राजद के हर फैसले में हां में हां मिलाती थी, वहीं इस बार उसने मुख्यमंत्री पद के चेहरे तेजस्वी यादव के नाम पर अंतिम क्षणों तक इंतजार करवाया। इससे स्पष्ट संदेश गया कि कांग्रेस अब राजद की परछाईं बनकर नहीं रहना चाहती और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने पर आमादा है।
कृष्णा अल्लावरु की नियुक्ति का असर साफ दिख रहा है—पार्टी ने किसी भी बाहुबली को टिकट नहीं दिया। कई दिग्गज नेता अपने बेटे-बेटियों के लिए जुगाड़ में लगे थे, लेकिन कांग्रेस ने सख्ती दिखाई। गठबंधन में शामिल दलों से थोड़ी खींचतान हुई, मगर पार्टी ने इसे कुशलता से सुलझा लिया। यह कदम न सिर्फ पार्टी की छवि को साफ-सुथरा बनाने का है, बल्कि जनता में विश्वसनीयता बहाल करने की रणनीति भी।
अब कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक को फिर से जोड़ने में जुटी है। सीमांचल में मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की कोशिश हो या मिथिलांचल के पारंपरिक गढ़ को मजबूत करना—हर मोर्चे पर मेहनत दिख रही है। बाहुबलियों से दूरी और स्वतंत्र फैसलों से पार्टी यह साबित करना चाहती है कि वह अब सिर्फ गठबंधन की सहयोगी नहीं, बल्कि बिहार की सियासत में मजबूत दावेदार है।










