दिनांक 23 अगस्त को dr श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय , रांची में पद्मश्री डॉ रामदयाल मुंडा की जयंती आयोजित की गई।
विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के द्वारा आयोजित इस जयंती कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया ।अतिथियों का स्वागत और विषय प्रवेश डॉ विनोद कुमार ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति dr तपन कुमार शांडिल्य ने प्रो, dr . रामदयाल मुंडा को स्मरण करते हुए कहा कि झारखंडी भाषा और संस्कृति को एक सूत्र में बांधने के लिए अखड़ा संस्कृति बचाए रखने को dr मुंडा ने आवश्यक बताया था। उन्होंने कहा कि डॉ रामदयाल मुंडा का संपूर्ण व्यक्तित्व एवं कृतित्व स्वयं में एक विलक्षण प्रतिभा का परिचायक है।

उन्होंने इसके उपरांत विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि dr रामदयाल मुंडा जी ने विदेश में शिक्षा ग्रहण करते हुए भी झारखंड के आदिवासियों के अस्तित्व की लड़ाई लड़ी। झारखंड के आदिवासियों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इन्होंने विदेशों तक इस मुद्दे को लेकर गएऔर बेबाक तरीके से झारखंड के आदिवासियों की स्थिति और यहां के बहुआयामी संस्कृति को विदेश के लोगों तक पहुंचाने का कार्य किया । विशिष्ट अतिथि के तौर आमंत्रित प्रो . Dr गोपाल पाठक, महानिदेशक, सरला बिरला विश्वविद्यालय, रांची ने प्रो रामदयाल मुंडा के साथ अपने संस्मरणों को विस्तार से साझा करते हुए उन्हें बहुमुखी प्रतिभा का प्रतीक बताया। उन्होंने उनके व्यक्तित्व से सीखने और आत्मसात करने की बात कही। इस अवसर पर dr पीपी महतो ने उनके साथ अपने निजी संस्मरणों को साझा किया। dr जिंदर सिंह मुंडा ने भी मौके पर अपने विचार व्यक्त किए। मंच संचालन डॉक्टर जय किशोर मंगल ने और धन्यवाद ज्ञापन लक्ष्मीकांत प्रमाणिक ने किया। इस अवसर पर इंदिरा राष्ट्रीय कला केंद्र के निदेशक, सपन रणवीर सिंह, जयमंगल किशोर, डूमिनी माय मुर्मू सहित सभी शिक्षक और छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। यह जानकारी पीआरओ प्रो राजेश कुमार सिंह ने दी।










