आज दिनांक 3 मई को dr श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, रांची के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग और आईक्यूएसी के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित dr वचनदेव कुमार मेमोरियल स्मृति व्याख्यानमाला के तहत एक विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया। विषय था, हिंदी के विकास में लोकभाषाओं का योगदान। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे, dr गुरुचरण सिंह, पूर्व अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग और प्रधानाचार्य एसपी जैन कॉलेज, सासाराम, रोहतास बिहार। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति dr तपन कुमार शांडिल्य ने कहा कि भारत की आत्मा हिंदी में निवास करती है।

हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है
हिंदी के विकास के लिए 12 विश्व हिंदी सम्मेलन हो चुके है। इन्होंने विद्यार्थियों को विशेष तौर पर संबोधित करते हुए कहा कि अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मगही, , नागपुरी, संताली आदि ऐसी भाषाएं हैं जिनका हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। लोकभाषा अगर नदी है तो हिंदी सागर है। दिनकर ने लिखा है कि जो बोली आत्मा से बोली जाती है, उसे हिंदी कहा जाता है। उन्होंने अपने संबोधन का अंत करते हुए कहा कि लोकभाषा हिंदी का प्राण और जीवन है। लोकभाषाओ से परिपुष्ट हिंदी भारत की आत्मा है। मुख्य वक्ता dr गुरुचरण सिंह ने कहा कि हिंदी के विकास में लोकभाषा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
समावेश लोकभाषा से ही हुआ
हिंदी में राष्ट्रप्रेम और लोकमंगल की भावना का समावेश लोकभाषा से ही हुआ। यदि लोक भाषाओं का संरक्षण नहीं किया गया तो हिंदी भाषा अपनी मूल संस्कृति से भटककर हिंग्लिश संस्कृति का शिकार हो जायेगी जो दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके अलावा उपरोक्त विषय पर dr प्रशांत कुमार कर्ण, हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष dr जेबी पाण्डेय , विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के जितेंद्र सिंह और मृत्युंजय कोयरी ने भी उपरोक्त विषय पर विस्तार से चर्चा की। विषय प्रवेश और अतिथियों का स्वागत विभागाध्यक्ष dr जिंदर सिंह मुंडा ने और धन्यवाद ज्ञापन dr विनोद कुमार ने किया। मौके पर dr पीयूष बाला, dr रेखा झा, प्रो राजेश कुमार सिंह, dr रजनी सहित अन्य शिक्षक और विद्यार्थी मौजूद थे।










