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डीएसपीएमयू में शिक्षक दिवस का आयोजन,एक पुस्तक, एक कलम और एक शिक्षक पूरे विश्व में बदलाव का प्रतीक – डॉ तपन कुमार शांडिल्य

September 5, 2024
in Jharkhand
डीएसपीएमयू में शिक्षक दिवस का आयोजन,एक पुस्तक, एक कलम और एक शिक्षक पूरे विश्व में बदलाव का प्रतीक – डॉ तपन कुमार शांडिल्य
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आज दिनांक 5 सितंबर को डीएसपीएमयू में शिक्षक दिवस के अवसर पर ‘सामाजिक बदलाव में शिक्षकों की भूमिका ‘ विषय पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के लोकपाल प्रो0 dr अंजनी श्रीवास्तव आमंत्रित थे। विशिष्ट अतिथि के तौर पर डीएसपीएमयू के दो पूर्व कुलपति dr यूसी मेहता और dr सत्यनारायण मुंडा आमंत्रित थे। कार्यक्रम का प्रारंभ सभी अतिथिगणों के द्वारा डॉ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की तस्वीर पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलित करके किया गया।

इसके उपरांत dr श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, रांची से सेवानिवृत हुए सभी वरिष्ठ शिक्षकों को कुलपति dr तपन कुमार शांडिल्य और विशिष्ट अतिथियों के द्वारा सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति dr तपन कुमार शांडिल्य ने सर्वपल्ली dr राधाकृष्णन के जीवन वृत पर रोशनी डालते हुए कहा कहा कि आज का दिन इसलिए भी प्रासंगिक है कि जब उनके शुभचिंतकों ने उनका जन्मदिन मनाने की बात कही तो उनका कहना था कि मेरा जन्मदिवस शिक्षक दिवस के तौर पर मनाए जाएं। उन्होंने आगे अपने संबोधन में शिक्षक की महत्ता पर कहा कि चाणक्य का यह मानना था कि प्रलय और निर्माण शिक्षक के दो पालने है, जिसका निर्धारण स्वयं शिक्षक के हाथों में है। उन्होंने उनकी एक विलक्षण गुण को बताते हुए कहा कि राधाकृष्णन जब बीएचयू के कुलपति थे, तो वह प्रत्येक रविवार को विश्वविद्यालय परिसर में स्थित विश्वनाथ मंदिर में भगवतगीता पर प्रवचन करते थे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो0 dr अंजनी श्रीवास्तव ने बताया कि आज के दिन सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी से ज्यादा उनके विचारों और पुस्तकों के बारे में जानना अधिक जरूरी है। राधाकृष्णन जी ने भारतीय दर्शन और पश्चिमी दर्शन को जोड़ा तथा भारतीय दर्शन को उत्कृष्ट बताया । भारतीय दर्शन ने ही सर्वप्रथम वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा रखी। उनके उत्तम कार्यों एवम योगदानों को देखते हुए वे 22 बार नोबल पुरस्कार के लिए नामित हुए , जिसमे से 16 बार साहित्य एवम 6 बार शांति के लिए नामित हुए थे। उन्होने आगे कहा की शिक्षक विशिष्ट शिक्षण पद्धतियों द्वारा सामाजिक बदलाव लाने में सक्षम हैं। ब्रिटिश काल में मात्र 4% को ही शिक्षा प्राप्त हुई थी किंतु वर्तमान में शिक्षा को और अधिक विस्तृत तथा गुणवत्तापूर्ण बनाने की आवश्यकता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच निरंतर संवाद होता रहना चाहिए। इस अवसर पर पूर्व कुलपति प्रो0 डॉ0 यू सी मेहता ने वर्तमान में शिक्षकों की कमी के कारण शिक्षा में आ रही गिरावटों की ओर ध्यान आकर्षित किया। पूर्व कुलपति प्रो0 एस एन मुंडा ने उच्च शिक्षा में शोध को बढ़ावा देने पर जोर दिया। विशिष्ट अतिथि के तौर पर आमंत्रित रांची विश्वविद्यालय के सेवा निवृत अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर dr आरके सिन्हा ने भी मौके पर अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के परफॉर्मिंग आर्ट की सुमेधा सेन गुप्ता और प्रियंका कुमारी ने काफी आकर्षक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। स्वागत भाषण dr अभय कृष्ण सिंह ने , मंच संचालन dr शुचि संतोष बरवार ने किया। इस अवसर पर कुलसचिव dr नमिता सिंह, डीएसपीएमयू से सेवानिवृत सभी शिक्षक, सभी पदाधिकारी, शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित थे। यह जानकारी पीआरओ प्रो राजेश कुमार सिंह ने दी।

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