भारतीय दूतावास द्वारा अमेरिका में राजनीतिक लॉबिंग और जनसंपर्क के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जुड़ी दो प्रमुख फर्मों को भारी-भरकम भुगतान करने का मामला सामने आने के बाद देश की सियासत गरमा गई है। सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, भारतीय दूतावास ने ट्रंप के करीबी जेसन मिलर के नेतृत्व वाली ‘SHW पार्टनर एलएलसी’ को अप्रैल 2025 से जून 2026 तक हर महीने 150,000 डॉलर का भुगतान किया। इस फर्म का मुख्य काम भारतीय अधिकारियों और अमेरिकी व्हाइट हाउस के दिग्गजों, जैसे ट्रेजरी സെക്രട്ടറി स्कॉट बेसेंट के बीच बैठकों और कॉल्स का समन्वय करना था, खासकर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो की भारत यात्रा से पहले। इसके अलावा, दूसरी फर्म ‘मर्करी पब्लिक अफेयर्स’ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई देने वाले ट्रंप के एक सोशल मीडिया पोस्ट का प्रचार करने के लिए 75,000 डॉलर प्रति माह दिए गए।

इस खुलासे के बाद कांग्रेस पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा सहित तमाम विपक्षी नेताओं ने मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी नेताओं ने कुल 225,000 डॉलर प्रति माह के इस संयुक्त खर्च को पूरी तरह से ‘करदाता के पैसों से चलने वाला पीआर स्टंट’ करार दिया है और जनता के धन की बर्बादी बताया है। उनका कहना है कि देश के संसाधनों का उपयोग इस प्रकार की विदेशी लॉबिंग और प्रचार के लिए करना पूरी तरह अनुचित है, जिससे सरकार की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
विपक्षी दलों के इन तीखे हमलों और आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय (MEA) ने इन सभी दावों को भ्रामक और निराधार बताया है। मंत्रालय का स्पष्ट कहना है कि विदेशी सरकारों द्वारा इस तरह की पेशेवर फर्मों और एजेंसियों की सेवाएं लेना कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह परंपरा साल 1948 से चली आ रही है जो कूटनीतिक और कूटनीतिक संवाद का एक नियमित हिस्सा है। सरकार ने इन नियुक्तियों को कूटनीतिक हितों को साधने के लिए पूरी तरह वैध और आवश्यक ठहराया है।










