हजारीबाग की इंटरनेशनल रामनवमी… नाम जितना बड़ा, तस्वीर उतनी ही शर्मनाक। ये उत्सव नहीं था, ये हमारे भीतर सड़ रहे अँधेरे का खुला नाच था।
सड़कों पर भीड़ थी, लेकिन इंसान नहीं थे। चेहरों पर संवेदना नहीं, आँखों में बस उन्माद। हाथों में तलवारें, भूंजालियाँ, लोहे के तरह-तरह के हिंसात्मक औज़ार… जैसे कोई धार्मिक जुलूस नहीं, बल्कि युद्ध के लिए निकली भीड़ हो। और डरावनी बात ये नहीं थी कि ये सब हो रहा था, डरावनी बात ये थी कि हर कोई इसे सही मान रहा था।
हर किसी को देखो तो “जय श्री राम” के नारे लगा रहा है, लेकिन उस जयकारे में न विनम्रता है, न मर्यादा, न करुणा। सच कहूँ तो राम कहीं दिख ही नहीं रहे थे। अगर थे भी, तो बस दीवारों पर लगे इश्तिहारों में। ज़मीन पर तो सिर्फ शोर था, आक्रामकता थी, और एक अजीब, बीमार कर देने वाला पागलपन।
और इसी पागलपन की एक तस्वीर में शामिल कोई ब्राउन के नशे में इतना धुत कि अपने ही पेट को चाकू से चीर रहा है। ये कोई दृश्य नहीं, एक आईना है। ये बता रहा है कि हम कितने गिर चुके हैं। ये सिर्फ नशा नहीं है, ये उस मानसिक सड़न का चरम है जहाँ इंसान खुद को भी नहीं छोड़ता।
लोग अपने अंदर के रावण का तांडव कर रहे थे। वो रावण जो अहंकार में अंधा होता है। वो रावण जो ताकत का प्रदर्शन करके खुद को महान समझता है। वो रावण जो दूसरों के डर में अपनी जीत ढूँढता है। फर्क बस इतना है कि उस रावण के दस सिर थे और यहाँ हर चेहरा ही एक नया सिर बन चुका है।
कड़वा लगेगा, लेकिन यही सच है। ये भक्ति नहीं, ये विकृति है। धर्म के नाम पर हिंसा को सजाकर परोसा गया, और हम सब उसे देखते रहे… कुछ तालियाँ बजाते रहे, कुछ वीडियो बनाते रहे, और कुछ चुप रहे उतने ही दोषी।
घरों के चार चिराग़ बुझ गए। कईयों के बहन की राखी, माँ का आँचल और बाप का सीना जल गया। सैकड़ों अब भी गम्भीर रूप में घायल पड़े हैं। लेकिन उसके बाद भी चेहरों पर पछतावा नहीं… बस वही उन्माद, वही शोर, वही अंधी भीड़।
ये सवाल अंदर तक चुभता है। अगर यही रामनवमी है, तो फिर राम का मतलब क्या रह गया? शायद हमने राम को खो दिया है। या शायद सच इससे भी ज़्यादा कड़वा है, हमने उन्हें कभी समझा ही नहीं।










